bhagwat geeta in hindi pdf

भगवत गीता कथा सारांश

भगवत गीता कथा सारांश

एक समय भगवान श्री हरि विष्णुजी क्षीर सागर में नींद ले रहे थे,तब माँ भगवती लक्ष्मीजी ने भगवान से पूछा की हे प्रभु आप सारे जगत का पालन करते है फिर भी ऐश्रर्य की तरह उदासीन से हो कर नींद ले रहे है | तब भगवान ने कहा मै नींद नहीं ले रहा हु मै अपने माहेश्वर तेज को देख रहा हु जिसका योगी, महात्मा, विद्धान जो वेदों का सार बताते है| उस मे भगवत गीता का सारांश है वह तेज एक अजर, अमर, प्रकाश स्वरूप,आत्म स्वरूप रोग -शोक से रहित अखण्ड आनन्द का निरिह तथा द्धैत रहित है | यह जगत उसी के अधिन है,मै उसी का अनुभव कर रहा हु, इसी लिये मै तुम्हे नींद लेता सा प्रतीत  हो रहा हु | यह भगवान विष्णु के वचन सुन कर यदि आप विराठ स्वरूप  है तो यह मन वाणी की पहुंच के बाहर है | तो यह भगवत गीता सारांश मे गीता का कैसे बोध कराती है | 

भगवत गीता सारांश में कृष्ण ने अपना वर्णन पाँच अध्यायो का किया है, जिसमे पाँच मुख,दस भुजाये,तथा एक उदर और दो भाग को चरण कमल जाना है यह ज्ञान मात्र से महान पापो का नाश करने वाली है | जो बुद्धि मान मनुष्य भगवत गीता के सारांश का अध्यायो का या श्लोको का प्रति दिन अभ्यास करता है वह सुशर्मा के जैसे पाप कर्म का नाश हो जाता है और सुशर्मा के समान मुक्त हो जाता है,यह सुशर्मा कौन था ? और वह कैसे मुक्त हुआ,उसका वर्णन आप भगवत गीता के सारांश में पढ सकते है | 

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सुशर्मा की कथा

सुशर्मा बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था | पापियों का तो वह शिरोमणि था | उसका जन्म वैदिक ज्ञानसे शून्य एवं क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाले ब्राह्मणो के कुल मे हुआ था | वह न ध्यान करता था,न जप,न होम करता था,न अतिथियों का सत्कार,वह लम्पट होने के कारण सदा विषयो के सेवन में ही आसक्त रहता था | हल जोजता और पत्ते बेचकर जीविका चलाता था | उसे मदिरा पीने का व्यसन था तथा वह मांस भी खाया करता था | इस प्रकार उसने अपने जीवन का दीर्घकाल व्यतीत कर दिया एक दिन मुढ़ बुद्धि सुशर्मा पत्ते लाने के लिये किसी ऋषि की वाटिका में घूम रहा था, इसी बिच में कालरूप धारी काले सांप ने उसे डस लिया | सुशर्मा की मृत्यु हो गई | तदन्तर वह अनेक नरकों में जाकर वहां की यातनाएं भोंग कर मृत्युलोकमें लौट आया और वहां बोझ  ढोनेवाला  बैल हुआ | और उस  समय किसी व्यक्ति ने अपने जीवन को आराम से व्यतीत करने के लिए उसे खरीद लिया | बैल ने अपनी पीठ पर उस व्यक्ति का भार ढोते हुए बड़े कष्ट से सात- आठ वर्ष बिताए | एक  दिन उस व्यक्ति ने किसी ऊँचे स्थान पर बहुत देर तक बड़ी तेजी के साथ उस बैल को घुमाया, इससे वह थक कर बड़े वेग से पृथ्वी पर गिरा और मूर्छित हो गया | उस समय वहां कोतुहलवश आकृष्ट हो बहुत से लोग एकत्रित हो गए | उस जनसमुदायों में से किसी पुण्यात्मा व्यक्ति ने उस बैल का कल्याण करने के लिए उसे अपना पुण्यदान किया, तत्पश्चात कुछ दूसरे लोगों ने भी अपने अपने पुण्यों को याद करके उन्हें उसके लिए दान किया | उस भीड़ में एक  वेश्या भी खड़ी थी,उसे अपने पुण्य का पता नहीं था तो उसने भी लोगों के देखा देखी उस बैल के लिए कुछ त्याग किया तदन्तर यमराज के दूत उस मरे हुए प्राणी को पहले यमपुरी में ले गए वहां यह विचार किया कि यह वेश्या के दिए हुए पुण्य से पुण्यवान हो गया है,उसे छोड़ दिया गया फिर वह भू लोक में आकर उत्तम कुल और सील वाले ब्राह्मणों के घर में उत्पन्न हुआ उस समय भी उसे अपने पूर्वजन्म की बातों  का स्मरण बना रहा बहुत दिनों के बाद अपने अज्ञान को दूर करने वाले कल्याणक तत्व का जिज्ञासु होकर वह उस वेश्या के पास गया और उसके दान की बात बतलाई और उसने पूछा तुमने कौन सा पुण्यदान किया था ? वेश्या ने उत्तर दिया वह पिंजरे में बैठा हुआ तोता प्रतिदिन कुछ पढता है, उससे मेरा अंतकरण पवित्र हो गया है उसी का पुण्य मैंने तुम्हारे लिए दान किया था और इसके बाद उन दोनों ने तोते से पूछा तब उस तोते ने अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया |  

 वह तोता बोला पूर्व जन्म में विद्वान होकर भी वह तोता अभिमान से मोहित रहता था,मेरा रागद्वेष इतना बढ़ गया था मैं गुणवान विद्वानों के प्रति भी ईर्ष्या भाव रखने लगा फिर समयानुसार मेरी मृत्यु हो गई और मैं अनेक लोको में भटकता फिरा उसके बाद इस लोक में आया सद्गुरु के अत्यंत निंदा करने के कारण तोते के कुल में मेरा जन्म हुआ पापी होने के कारण छोटी अवस्था में ही मेरे  माता पिता से वियोग हो गया एक  दिन में ग्रीष्म ऋतु में तपे हुए मार्ग पर पड़ा था वहां से कुछ श्रेष्ठ मुनि मुझे उठा लाए और महात्माओं के आश्रय में आश्रम के भीतर एक  पिंजरे में उन्होंने मुझे डाल दिया वहीं मुझे पढ़ाया गया ऋषियों के बालक बड़े आदर के साथ गीता के प्रथम अध्याय की आवृति करते थे उन्हीं से सुनकर मैं भी बारंबार पाठ करने लगा इसी बीच में एक चोरी करने वाले बहेलिए ने मुझे वहां से चुरा लिया तत्पश्चात इस देवी ने मुझे खरीद लिया यही मेरा वृतांत है जिसे मैंने आप लोगों से बता दिया हूं पूर्वकाल में मैंने इस प्रथम अध्याय का अभ्यास किया था जिससे मैंने अपने पापों को दूर किया फिर उसी से इस वेश्या का भी अन्तकरण शुद्ध हुआ है और उसी के पुण्य से ये श्रेष्ठ सुशर्मा भी पाप मुक्त हुआ |

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इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भगवत गीता का सारांश जानता है या भगवद गीता का अध्याय करता है उसको अपने जीवन मृत्यु से मुक्ति मिलती है और वो आत्मा परमात्मा में लीन हो जाते है |भगवद गीता को महाभारत के समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था|   व्यावहारिक दृष्टि से यह एक ज्ञान है, इससे आप अगर यह जान लें कि हम एक आत्मा है, और यह संसार एक कारागृह हैं तो आप भगवद गीता के ज्ञान को जान पाएंगे और मनुष्य अपने अपराधों का दंड भोगने के लिए पृथ्वी पर जन्म लेते हैं और भगवत गीता मनुष्य को उन अपराधों से मुक्ति का रास्ता बताती हैं इस पुस्तक में भगवान ने जीवन की जो राह दिखाई है इस भगवत  गीता में अगर मनुष्य इस रास्ते पर चल तो मनुष्य मुक्ति पा सकता है |  

पर अब मनुष्य कलयुग के प्रत्येक चरण पर मनुष्य आधुनिकीकरण के कारण भगवान व सनातन धर्म और संस्कृति कहीं लुप्त सी हो गई है और मनुष्य भगवान पर विश्वास करना कम कर दिया है यहां भगत की और यह भगवत गीता का ज्ञान मनुष्य से दूर हो गया है जहां पापों का बोलबाला है इन्सान लोभ  के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है | भाई अपने भाई की हत्या कर सकता है, माता पिता का मान सम्मान, भाई बहन का प्यार, सभी कुछ समाप्त सा हो गया है इसी कारण इस घोर पाप के युग में भगवत गीता का ज्ञान अगर मिल जाए तो मनुष्य के जीवन में शांति और सुख का वातावरण मिल सकता है इसीलिए अगर मनुष्य रोज भगवत गीता का पाठ करें या उनके मंत्रों का जाप करें तो भी एक अलग ही शान्ति का आभास होगा इस भगवत गीता के  अठारा  अध्याय हैं उन अध्यायों में से हमें उस ज्ञान की प्राप्ति होती है जो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया भगवद गीता के अध्यायों में यह बताया गया है, कि जब जब धर्म समाप्त के कंगार पर आता है तब भगवान इस धरती पर अवतार लेते हैं और फिर से धर्म की स्थापना करते हैं | भगवत गीता का उपदेश भगवान ने अर्जुन को इसीलिए दिया था, कि कलियुग में जब  ऐसी स्थिति होगी और मनुष्य पापों की तरफ बढ़ेगा इसे ध्यान में रखकर  ही भगवान कृष्ण ने लगभग पांच हजार वर्ष पहले इस भगवत गीता का उपदेश दिया था,जो व्यक्ति इन उपदेशों का पालन करते हैं वो उद्धार की राह की तरफ अग्रसर होते हैं भगवत गीता में यह बताया गया है कि आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध क्या है? 

इस संसार में ऐसा क्या है, मनुष्य के जन्म लेने का उद्देश्य क्या है, ऐसा क्या है जो इस भगवत गीता में जो मनुष्य को योग करा देता है और जीवन व मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिला देता है भगवत गीता के अंतिम श्लोक में संजय ने कहा कि यह जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण है वहां धनुर्धारी (गांडीवधारी) अर्जुन है वहीं पर श्री विजय विभूति और धर्म है महाभारत में जब अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया कि मैं अपने ही भाइयों को कैसे मार सकता हूं तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जीवन की सत्यता धर्म बताते हुए अर्जुन को  अपना वास्तविक रूप बताया और अर्जुन ने कहा परमात्मा में आपका कैसे ध्यान करु भगवान ने कहा मैं समस्त जीवों के ह्रदय में हूं इसीलिए मैं सभी जगह पर हूं मैं मनुष्य, में गायों में, नागो में, पशुओं में, गज में, कुबेर  में, नारद  में, वायु में, नक्षत्र और सभी जीवों में, जीवात्मा में, सभी जीवों के मध्य हूं मैं सभी स्थान पर हूं सभी जगह मैं ही हूँ यह भगवत गीता में भगवान ने कहा है, हे अर्जुन यह समस्त संसार मुझसे है मैं इस संसार में सभी जगह पर व्याप्त हूं, भगवद गीता में भगवान ने अर्जुन को अपना दिव्य विराट स्वरूप के दर्शन करवाए और भगवान ने जो मनुष्य भगवत गीता के उपदेश के अनुसार जीवन यापन करेगा उसको जीवन – मृत्यु से मुक्ति मिलेगी भगवत गीता में भगवान ने कहा कि अगर मेरी शरण में आना चाहते हों तो मेरी भक्ति करो भक्ति शरीर से नहीं आत्मा से करो जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भोजन की ज़रुरत है उसी प्रकार आत्मा को स्वस्थ रखने के लिए भक्ति की ज़रुरत है भगवत गीता में भगवान ने कहा है कि मनुष्य जीवन एक ऐसा अवसर है जब व्यक्ति आत्मा को परमात्मा में विलीन कर सकता है और वह भगवत गीता के माध्यम से ही संभव है जैसा मनुष्य माया में फंसकर व्यक्ति लोभ मोह माया में फंस कर भगवान को भूल जाता है | 

आत्मा इस दुनिया के सुख दुख से पराभिवक्त नहीं होती, भगवत गीता में भगवान कहते हैं आत्मा का स्वभाव  आनन्द में रहना है मनुष्य जीवन चार स्तंभ पर है | अर्थात मोक्ष का ज्ञान जिस मनुष्य को हो जाता है उसे इस संसार से मुक्ति मिल जाती है |धर्म-अर्थ,मोक्ष-काम का ज्ञान जिस मनुष्य को हो जाता है,उसे इस संसार से मुक्ति मिल जाती है| भगवान भगवद गीता में बताते हैं, कि धर्म अर्थ हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यह धर्म नहीं है बल्कि कर्म करते हुए मनुष्य को जीवन कैसे जीना है और उसका उपयोग कैसे करना है शास्त्रों में नियमबद्धता शास्त्रों में बताए नियमों का पालन करना ही धर्म है | 

अर्थ का मतलब है आत्मा अपने अस्तित्व का अर्थ समझ कर इस संसार में रह कर अपने शारीरिक सम्बन्ध निभाते हुए कर्त्तव्य कर सांसारिक सुख भोगते हुए खुद को भगवान से जोड़े|  काम प्रत्येक मनुष्य का क्रोध, लोभ,मोह, को त्याग कर भगवान का ध्यान करे|  मोक्ष जब तक सादा जीवन का पालन करते हुए इच्छाओं का त्याग करके नियमों का पालन करने से मोक्ष मिलता है |  भगवत गीता में कर्म योग, राज योग, और ज्ञान योग, को बताया गया है|  भगवत गीता में भगवान ने कहा है कि जो व्यक्ति खुद को मुझे सौंप देता है उसे मैं स्वीकार करके अपनी शरण में ले लेता हु | भगवद गीता को पढ़ने से आत्मा का परमात्मा से मिलने का ज्ञान प्राप्त होता है |

 

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